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एक ख्वाब ले आया मुझे भारत की दहलीज पर

(लेखक युसूफ किरमानी पेशे से पत्रकार हैं और इन दिनों समाचार पत्र के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं |)

बैले नृत्य से कोई कैसे खुद को भारतीय शास्त्रीय नृत्य की शैली में ढाल लेता है यह कोई लुइस मारिया चबुशनिग से सीखे। उन्हें हाल ही में एक प्रतिष्ठित भारतीय पुरस्कार एकलव्य से नवाजा गया है। इटली में पैदा हुई और जर्मनी के थिएटर ग्रुप से लंबे वक्त जुड़ी रही मारिया को कुचिपुड़ी का इंटरनैशनल एंबेसडर बनाया गया है। पेश है उनका इंटरव्यू....

क्या आपको लगा था कि एक दिन भारत से आपको एकलव्य पुरस्कार लेने का बुलावा आएगा। आपके नृत्य की यात्रा इटली से शुरू होकर पेरिस, जर्मनी, अमेरिका और फिर भारत पहुंची। आप इस बारे में कुछ बताइए |

कुचीपुड़ी नृत्य में एक मुकाम हासिल करना मेरा एक ख्वाब था, उसी ख्वाब का पीछा करते-करते मैं यहां तक पहुंची। नृत्य किसी एक देश की जबान या भाषा नहीं है, यह वैश्विक भाषा है, इसके जरिए अगर मैं अपना संदेश रत्तीभर भी पहुंचा सकी तो यही मेरा मकसद है। यूरोप में अपने प्रशिक्षण के दौरान कदम-कदम पर मैंने वह प्रयोग किए जो भारत की अपनी विशेषता है, चाहे वह जिंदगी जीने का तरीका हो या नृत्य की शैली हो। कभी नहीं सोचा था कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य में मेरा जुनून मुझे एकलव्य पुरस्कार दिलाएगा। लेकिन 7 जनवरी को जब यह मिला तो लगा कि मैं कोई सपना तो नहीं देख रही।

चार साल की उम्र में आपको सिर्फ पश्चिमी बैले के बारे में मालूम था। जर्मनी के बयरुथ बरीक थिएटर के बाद फिर आप अचानक कुचिपुड़ी की ओर कैसे मुड़ गईं ?

जब मैं 7 साल की थी, तभी से भारत मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया और अचानक एक दिन यहां के शास्त्रीय नृत्य ने मुझे अपनी ओर खींच लिया। जब सन् 2000 में मैं यहां आई तो मैं एक पूर्ण बैले डांसर बन चुकी थी पर इसके बाद मैं भारतीय परफॉर्मिंग आर्ट की विरासत के मोह में फंसती चली गई। तब तक मुझे नहीं पता था कि मुझे कौन सा नृत्य सीखना चाहिए और कौन सा नहीं। संयोग से कुचीपुडी परंपरा की एक डांस गुरु से मुलाकात हुई, मैं उन्हें बता ही नहीं पाई कि दरअसल मुझे उनसे क्या सीखना है। वह जैसा मुझे बताती रहीं, मैं वैसा ही करती रही।

भारत के शास्त्रीय नृत्य और संगीत के क्षेत्र में गुरु-शिष्य परंपरा पर क्या सोचती हैं ?

इस सवाल के जवाब से कई विवाद उठ खड़े होंगे। मुझे पक्की तौर पर यह भी पता है कि कुछ लोग मेरे जवाब से नाखुश भी होंगे। बहरहाल अब जो भी हो। मेरी नृत्य शिक्षा पूरी तौर पर गुरु-शिष्य परंपरा के तहत ही हुई है। मेरा सौभाग्य रहा कि पूरे होशो-हवास में मैंने इसे चुना और कम से कम मेरे मामले में तो परंपरा को ही कामयाबी मिली।

लेकिन क्या ऐसी कामयाबी हमेशा मिला करती है। या सिर्फ यही सफलता का मूलमंत्र है। और अगर हां तो इसकी कीमत क्या है ?

मुझे प्लीज आप एक यूरोपियन की नजर से न देखें। परंपरा में तमाम तरह के प्रतिबंध, कड़ा अनुशासन, तमाम तरह की शर्ते रहती हैं और इससे कहीं न कहीं जिस टैलंट को कुदरती आगे बढ़ना चाहिए वह मुरझा जाता है। इसलिए मुझे तो एक मिक्स सिस्टम पसंद है, जहां परंपरा भी हो और आपके टैलंट को आगे बढने दिया जाए।

किन भारतीय कलाकारों ने ज्यादा प्रभावित किया ?

मैं अपनी गुरु चित्रांगी उपमाह मैडम से बहुत प्रभावित हूं। मेरी जिंदगी पर उनकी छवि का बहुत असर है। उनके साथ-साथ मल्लिका साराभाई, स्वपन सुंदरी, नाहिद सिद्दीकी और पारुल शाह ने मुझे नृत्य में एक विजन दिया। विद्वानों में मुझे कपिला वात्सायन के अलावा किसी की जरूरत नहीं पड़ी।

आप भारतीय नृत्य को सिर्फ परफॉर्मिंग आर्ट मानती हैं या कुछ और ?

मैं अक्सर कहती हूं कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य को सिर्फ परफॉर्मिंग आर्ट न समझा जाए। क्यों कि यह इससे भी बेशकीमती है। तमाम लेवल खुद को अभिव्यक्त करने का यह एक रास्ता है, एक उत्तर है और एक अलग तरह की सवारी है। भारत को लेकर कोई फ्यूतर प्लान भलिष्य के हिसाब से मेरे लिए 2012 में भारत में करने को बहुत कुछ है। एक बैले अकादमी से यहां मैं जुड़ने वाली हूं। ताजमहल पर मेरी एक नृत्य नाटिका तैयार हो रही है। इसमें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होगी। इसके लिए डागर बंधुओं से बात की गई है।

भारत के युवाओं के बारे में क्या सोचती हैं ?

भारतीय युवा सबसे अलग और दुनिया के सबसे काबिल दिमाग वाले हैं। भारत की चमकती तस्वीर के असली हीरो वही हैं। लेकिन अब उनके लिए सबसे मुश्किल दौर आ रहा है। उन्हें पश्चिमी और अमेरिकी संस्कृति के जाल में फंसाया जा रहा है। ये हालात उनकी मौलिकता को खत्म कर सकते हैं और उन्हें अपने कल्चर का गुलाम बना सकते हैं। उससे बचना होगा। पश्चिम की कुछ चीजें अच्छी हैं लेकिन वहां खराब चीजों की तादाद ज्यादा है।

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Comments

thanks acha lga bhart ko jano ye sandesh duniya ko dena hai

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