(By प्रभात शर्मा...)
घर से ऑफिस तक के सफ़र में ट्रैफिक गाहे-बगाहे महाभारत की याद ताज़ा कर देता है | हमने पूरा छोड़,
आधा-अधूरा भी इस चक्रव्यूह से निकलने का राज़ सुना होता तो जयपुर का ट्रैफिक कुछ हद तक हमारी परेशानी की वजह कम कर देता | मुझे लगता है पहियों पर सवार हर कोई ख़ुद को आज का अभिमन्यु समझता है, तभी तो वो घर से ऑफिस और ऑफिस से घर तक कैसे न कैसे कुलांचे भरते हुए पहुँच ही जाता है |
चारदीवारी तो अभेद्य क़िले की तरह लगती है | महाभारत में योद्धा लाल होते थे, आज के योद्धा काले होते हैं; धुएं से | घर से एक बार निकले नहीं कि कपड़ों पर कालिख हमारा मैडल तय करती है | जितनी ज़्यादा कालिख, युद्ध में उतनी अन्दर तक सेंध | आप एक बार निकलिए तो सही, ट्रैफिक आपको नानी क्या, सारे रिश्तेदार याद दिला देगा | कभी किसी रैड लाइट पर तो कभी अंडरकंस्ट्रक्शन अंडरपास पर, कभी गाड़ियों से सड़कों पर आड़ी-तिरछी लकीरें बनाते स्टंटी युवा से, कभी आगे निकलने की होड़ में जद्दोजहद करने वालों से | इसमें हमारे ट्रैफिककर्मी किसी दुर्योधन से कम नहीं हैं | गुमटियों में ऊंघते, सुस्ताते सरकारी कारिंदे; कोई जीए या मरे, इनकी बला से |
अब अगर महाभारत ही शुरू हो गयी है तो "इस दुनिया में कोई किसी का नहीं, तेरा क्या है, मेरा क्या है, दुनिया मायाजाल है" बस यही याद है | ख़ैर जब थोडा फ़र्ज़ याद आएगा तो ट्रैफिक के साथ ऐसी उठापटक करेंगे कि जाना चाहोगे सांगानेर और पहुँच जाओगे आमेर | सरकारी फिज़ूलखर्ची की मिसाल खासाकोठी ओवरब्रिज क्यों बनाया गया, आज तक हमारे सर के ऊपर से निकल जाता है | विभाग ने ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के लिए हर बड़े ट्रैफिक पॉइंट पर तीसरी आँख से नज़र भी रखने की कोशिश की, पर लगता है इन आँखों में मोतियाबिंद हो गया है | इस मोतियाबिंद का इलाज ज़रूरी है, वरना हालात हमारी कल्पना की सीमा लाँघ सकते हैं |
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