‘‘यूनानी तिब के मौलिक सिद्धांत संपूर्ण स्वास्थ्य की गारंटी’’ विषय पर दो दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अजमल खां तिब्बिया कॉलेज के कुल्लियात विभाग के तत्वावधान में ‘‘यूनानी तिब के मौलिक सिद्धांत संपूर्ण स्वास्थ्य की गारंटी’’ विषय पर दो दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसके उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए मुख्य अतिथि भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के सचिव प्रख्यात वैद्य श्री राजेश कोटेचा ने कहा कि यूनानी और आयुर्वेद समेत विभिन्न परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों के विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं को मौलिक विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग करके अन्तर-विषयी शोध के विकास में भाग लेना चाहिए ताकि विज्ञान के आधुनिक मापदण्डों पर उन्हें प्रमाणित किया जा सके।

‘‘यूनानी तिब के मौलिक सिद्धांत संपूर्ण स्वास्थ्य की गारंटी’’ विषय पर दो दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन
‘‘यूनानी तिब के मौलिक सिद्धांत संपूर्ण स्वास्थ्य की गारंटी’’ विषय पर दो दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन

श्री कोटेचा ने कहा कि परम्परागत ज्ञान के सिद्वातों को आधुनिक विज्ञान के मापदण्डों पर प्रमाणित करना एक कठिन प्रक्रिया है, परन्तु इसे फार्माकालॉजी, बायोलॉजी, कैमिस्ट्री, फिजिक्स आदि विषयों के साथ संयुक्त अध्ययन के बाद अधिक कारगर और लाभप्रद बनाया जा सकता है। श्री कोटेचा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आगमन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि वो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी संस्थापक और महान समाज सुधारक सर सैयद अहमद खान को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनकी कुर्बानियों और दूरदर्शिता से इस विशाल संस्था का अस्तित्व हो सका है।

श्री कोटेचा ने कहा कि उन्होंने हाल ही में ईरान का दौरा कर चिकित्सकीय पौधों के प्रयोग और उन पर किए जाने वाले शोध में दोनों देशों के मध्य सहयोग पर एक करार किया है। इससे दोनों देशों के मध्य इस क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि भारत ने हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ आयुष की शब्दावली के वैश्विक स्तर के निर्धारण के लिए करार किया है।

अपने अध्यक्षीय भाषण में सहकुलपति प्रो. अख्तर हसीब ने कहा कि परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों में जिन पौधों से दवाएं तैयार की जाती हैं उनकी पैदावार बढ़ाने और उनके वर्गीकरण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि चिकित्सीय पौधों की क्वालिटी और उसके औषधीय गुणों को संरक्षित रखने पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस यूनिवर्सिटी के दवाखाना तिब्बिया कॉलेज में इस दिशा में विशेष ध्यान दिया जाता है और यही कारण है कि दवाखाने की औषधियां भारत के बाहर भी प्रसिद्व हो रही हैं।

नई दिल्ली स्थित ईरान के कल्चरल काउंसलर डॉ. मोहम्मद अली रब्बानी ने कहा कि भारत और ईरान के सम्बन्ध बहुत पुराने हैं और परम्परागत चिकित्सा पद्धति के क्षेत्र में दोनों देशों ने एक दूसरे से बहुत लाभ अर्जित किया है। उन्होंने इस अवसर पर एक पुस्तक भी अतिथियों को भेंट की।
कॉन्फ्रेंस के आयोजन अध्यक्ष और विभागाध्यक्ष प्रो. फिरासत अली खान ने अतिथियों का स्वागत करते हुए विभाग के इतिहास और कॉन्फ्रेंस के उद्देश्यों पर पर प्रकाश डाला।

यूनानी मेडिसन संकाय के अधिष्ठाता प्रो. एम. मुहिउल हक सिद्दीकी ने शिक्षकों और छात्रों की उपलब्धियों का वर्णन करते हुए कहा कि इस कॉलेज से शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र-छात्राएं देश की बड़ी शिक्षण संस्थाओं में सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने यूनानी संकाय में 4 विभागों में नए पी.जी. कोर्सेज की मंजूरी देने के लिए आयुष मंत्रालय के सचिव का धन्यवाद किया।

CCRUM के डायरेक्टर जनरल प्रो. आसिम अली खान ने काउन्सिल की उपलब्धियों का वर्णन करते हुए कहा कि यूनानी पद्धति पूरे विश्व में ख्याति प्राप्त कर रही है और तजाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका, ईरान और बांग्लादेश के यूनानी संगठनों और संस्थाओं के साथ शोध और अध्ययन के कई समझौते किए गए हैं।

अजमल खां तिब्बिया कॉलेज के प्रिन्सिपल प्रो. सऊद अली खान ने अतिथियों का धन्यवाद किया
और प्रो. एफ.एस. शीरानी ने कार्यक्रम का संचालन किया। इस अवसर पर श्री कोटेचा सहित अन्य अतिथियों ने कॉन्फ्रेंस की स्मारिका का विमोचन किया।

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