उत्तरप्रदेश के शिक्षा मंत्री को केंद्रीय हिन्दी समिति के सदस्य का पत्र

शिक्षण पद्धति में हिंदी भाषा को प्रमुख स्थान दिलवाने के लिए केंद्रीय हिंदी समिति के सदस्य प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी ने उत्तरप्रदेश के शिक्षा मंत्री दिनेश शर्मा को एक पत्र लिखा है। ये पत्र अक्षरश: नीचे लिखा गया है –

सेवा में
श्री दिनेश शर्मा,
माननीय उप मुख्य मंत्री और
शिक्षा मंत्री, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा विभाग,
नवीन भवन, उत्तर प्रदेश सचिवालय,
लखनऊ – 226 001 (उ.प्र.)

माननीय महोदय, यह जान कर अत्यंत दु:ख हुआ कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने प्रदेश के प्राथमिक और माध्यमिक सरकारी तथा सरकारी मान्यता-प्राप्त स्कूलों में हिन्दी के स्थान पर अंग्रेज़ी को शिक्षा-माध्यम अपनाने के लिए निर्देश दिए हैं। साथ ही भविष्य में सरकार स्वयं भी अंग्रेज़ी माध्यम के सरकारी स्कूल खोलने की योजना बना रही है। वस्तुत: यह कदम हिन्दी और भारतीय संस्कृति के लिए न केवल हानिकारक है बल्कि घातक भी है। यह कैसी विडंबना है कि आज़ादी के 70 वर्ष बाद भी अंग्रेज़ी के प्रति हमारा मोह अभी भी नहीं छूटा है जबकि हमारे देश भारत में अनेक भाषाएँ हैं जिनमें सौ से अधिक बड़ी भाषाएँ तो बोली, पढ़ी और लिखी जाती हैं। फिर पता नहीं, हम विदेशी भाषा अंग्रेज़ी का क्यो निर्भर रहना चाहते हैं, जबकि हमारी भाषाएँ शिक्षा-माध्यम के रूप में पूरी तरह सक्षम और समर्थ हैं। शिक्षा जगत के न केवल विद्वानों ने बल्कि कई महापुरुषों ने भी मातृभाषा को ही शिक्षा का उत्कृष्ट माध्यम माना है। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हरिजन के 9 जुलाई, 1938 के अंक में स्वयं अपने विद्यार्थी जीवन के अनुभव बताते हुए मातृभाषा के महत्व और उपयोगिता को बताया था। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि मातृभाषा में विद्यार्थी को अपना विषय समझने में सरलता और सुगमता होती है। अपने विषय को सीखने और समझने की पकड़ अपनी मातृभाषा में बच्चे के लिए अधिक आसान और स्पष्ट तो होती ही है, साथ ही अध्यापक के लिए भी विषय को समझाना और पढ़ाना सरल हो जाता है। विदेशी भाषा में अपने विषय काफी समय तक समझ में नहीं आते और अगर आ भी जाते है तो आधे-अधूरे। अंग्रेज़ी जैसी भाषा को तो दिमाग में बिठाना भी बहुत ही कष्टकारी होता है, क्योंकि वह जैसी लिखी जाती है वैसी बोली नहीं जाती। इसकी वर्तनी (स्पेलिंग) और उच्चारण को ही सीखने में काफी समय लग जाता है। हमारा दुर्भाग्य है कि शिक्षा के प्रति हमारा दृष्टिकोण उपेक्षित, उदासीन और संवेदनहींन रहा है। हम यह नहीं जानते या जानने की कोशिश नहीं करते कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने पर बच्चे में राष्ट्रवादी भावना, भारतीय संस्कृति और जीवनादर्श के संस्कार बचपन से ही पैदा हो जाते है।

सन् 1835 में ब्रिटिश सलाहकार मैकाले ने भारत में जिस शिक्षा व्यवस्था को लागू किया था, वह भारतीय संस्कृति और परंपरा को खत्म करने की साजिश थी, लेकिन हमने आज तक उसके आशय को नहीं समझा और इसीलिए उस शिक्षा अवस्था से आगे बढ्ने की कोशिश ही नहीं की। मैकाले को न तो भारतीय संस्कृति का ज्ञान था और न ही किसी भारतीय भाषा का। साथ ही, वह तो भारतीय संस्कृति को भारत से खत्म करना चाहता था। वह भारत को अंग्रेज़ी साम्राज्य का एक उपनिवेश या कॉलोनी के रूप में मानता था। इसलिए उसने अपनी साम्राज्यवादी शक्ति का प्रयोग करते हुए तत्कालीन भारत पर अंग्रेज़ी को थोपा, क्योंकि वह अपनी मातृभाषा अंग्रेज़ी को विश्व की भाषाओं में सर्वाधिक उत्कृष्ट और समृद्ध मानता था और इसी से वह हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता को खत्म करना चाहता था। भारत सरकार द्वारा गठित शिक्षा आयोगों ने भी शिक्षाशास्त्रीय दृष्टि से समय-समय पर यही कहा है कि विद्यारंभ करने वाले विद्यार्थी के लिए उसकी मातृभाषा ही सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 में शिक्षा का प्रारूप भारत, भारतीयता और भारतीय को केंद्र में रख कर तैयार किया गया है। भारत और भारतीय संस्कृति को ध्यान में रखते हुए हमारे देश के भारतीय संस्कृति के महान उपासक, मनीषी तथा चिंतक और तत्कालीन भारतीय जन संघ (वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी) के अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय ने 23 अक्टूबर 1961 को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि अंग्रेज़ी राष्ट्रीय चेतना की घातक है और इससे भारतीय लोग भारत की आत्मा को पहचान नहीं पाएंगे। उन्होंने तत्कालीन मद्रास (चेन्नई) में दिए साक्षात्कार में भी कहा था जो 26 जनवरी, 1965 के ऑर्गेनाइजर समाचार-पत्र में प्रकाशित हुआ था कि अंग्रेज़ी में एक ऐसा विदेशी तत्त्व है जो ब्रिटिश राज्य में भारत की एकता में एक कृत्रिम और नकारात्मक भूमिका निभा रहा था जबकि सकारात्मक और रचनात्मक एकता तो केवल अपनी भाषा से ही संभव है।

इस बात का भी मैं उल्लेख करना चाहूंगा कि पिछली शताब्दी के पांचवें दशक में मैं प्राथमिक कक्षाओं का विद्यार्थी था और उस समय अंग्रेज़ी पांचवीं कक्षा से प्रारंभ होती थी। क्या हमारी शिक्षा आज की शिक्षा से अच्छी नहीं थी? उस समय की शिक्षा का स्तर आज की शिक्षा से कई गुना बेहतर था। एक अध्यापक और शिक्षाविद होने के नाते मैं यह दावा निजी अनुभवों के आधार पर कर रहा हूँ।

हम लोग इस भ्रम में हैं कि अंग्रेज़ी में पढ़ने वाले बच्चे अधिक मेधावी और कुशल होते हैं? ऐसा कदापि नहीं है। यह केवल भुलावा और छलावा है कि अंग्रेज़ी से बच्चा होशियार और चुस्त या स्मार्ट हो जाता है। अगर सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर को वैज्ञानिक दृष्टि से सुधारने का प्रयास किया जाए, स्कूलों को आधुनिक सुविधाएँ दी जाएँ और उनके अध्यापक ईमानदारी तथा मेहनत से शिक्षण-कार्य कराएं तो कोई वजह नहीं कि ये स्कूल भी अंग्रेज़ी के बिना भी शिक्षा के उच्च स्तर पर पहुँच सकते हैं। फ़िनलैंड, स्वीडन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया आदि अनेक देशों के उदाहरण हमारे सामने हैं। इस प्रयास में हिन्दी का योगदान उल्लेखनीय होगा और सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का मानसिक विकास तो होगा ही, वह अपने देश के समाज, संस्कृति, परंपरा और जीवन-शैली से भी अवगत होगा। बचपन में पड़े संस्कार प्राय: जीवन-पर्यंत विद्यमान रहते हैं। मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने से बच्चा न तो नकलची बनता है और न ही रटंतू। वह अपने आने वाले जीवन में कुशल और मेधावी नागरिक बनेगा।

अत: आपसे निवेदन है कि इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए और प्राइमरी और माध्यमिक सरकारी और निजी स्कूलों में हिन्दी-माध्यम से ही पढ़ाई होने दी जाए। इससे हिन्दी और भारतीय भाषाओं के साथ-साथ शिक्षा का तो विकास होगा ही, साथ में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का संरक्षण एवं अनुरक्षण भी होगा और छात्र सच्चा भारतीय और राष्ट्रभक्त बन कर उभरेगा। यही तो है शिक्षा का मुख्य उद्देश्य।
प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी
सदस्य, केंद्रीय हिन्दी समिति
भारत सरकार

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