“हिंदी, सिंधी और मराठी भाषा, साहित्य और संस्कृति” पर हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी

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“मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय, मुम्बई में हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी”
“भारतीय भाषाओं को एक साथ मिलकर चलना होगा”

हिंदी विभाग और गांधी अध्ययन केंद्र, मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय, मुंबई ( Mumbai ) और राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, नई दिल्ली ( New Delhi ) के संयुक्त तत्वावधान में 18 सितंबर 2019 को भाषा, साहित्य और संस्कृति पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी ( National Seminar ) आयोजित हुई। ये संगोष्ठी हिंदी, सिंधी और मराठी भाषाओं के संदर्भ में हुई।

संगोष्ठी का उद्घाटन महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष डॉ. शीतला प्रसाद दुबे और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के उपनिदेशक शैलेष बिडालिया ने किया। डॉ. दुबे ने कहा कि हिंदी ( Hindi ) को अपने साथ सिंधी ( Sindhi ), मराठी ( Marathi ) और अन्य भाषाओं को लेकर चलना होगा, तभी संस्कृति की उन्नति संभव है। बिडालिया ने कहा कि अब केंद्रीय हिंदी निदेशालय सिंधी भाषा को देवनागरी लिपि में लिखने की शुरुआत कर रहा है, जिससे भाषा को बचाया जा सके। अरबी लिपि में लिखी हुई सिंधी भाषा को समझने वाले बहुत कम लोग बचे हैं। संगोष्ठी में डॉ. जवाहर कर्णावट, सुधा अरोड़ा, प्रो. हूबनाथ, वसुधा सहस्रबुद्धे, रेखा देशपांडे, डॉ. प्रज्ञा शुक्ल आदि ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए।

हिंदी विभाग मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रतन कुमार पांडेय ने समापन सत्र में बोलते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति समावेशी रही है। हम अपनी भाषाओं को बचाएंगे तो साहित्य जीवित रहेगा क्योंकि साहित्य ही संस्कृति का वाहक होगा। समापन सत्र के मुख्य अतिथि साहित्य अकादमी के क्षेत्रीय सचिव और अनुवादक प्रकाश भातंब्रेकर ने कहा कि तुलनात्मक अध्ययन का कार्य अनुवाद और आदान प्रदान के द्वारा सरल बन जाता है।

डॉ. रवीन्द्र कात्यायन ने बताया कि संगोष्ठी में 25 विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए और करीब 100 लोगों ने प्रतिभागिता की। नानावटी महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. राजश्री त्रिवेदी ने संगोष्ठी में आए सभी अतिथियों का धन्यवाद दिया। गांधी अध्ययन केंद्र की संयोजक डॉ. सेजल शाह ने संगोष्ठी का कार्यवृत्त प्रस्तुत किया। संगोष्ठी का संयोजन हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. रवींद्र कात्यायन ने किया।

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